Friday, July 3

शायरी/गज़ल(Shayari/Gazal) – Jab bhi Tumhari photo dekhta hun/तुम्हारी फोटो देखता हूं

  शायरी/गज़ल  
                                      





  तुम्हारी फोटो देखता हूं…… 





जिंदगी जीने का तु इंतजार मत कर 
बस इस वक्त को चूम ले 
और अब खुदा से कोई नई गुहार कर। 


करी मैंने एक नई गुजारिश इस खुदा से 
तुरंत ही दिख गयी एक नयी मुस्कान मुझे वहां पें 


वक्त ज़ाया ना किया और समझ गया 
इतनी गुजारिशों का फल है आज मैंने पाया 


देखा जाते हुए उसे मैंने 
पर शायद उस वक्त जाग गया दिल मेरे सीने में 


इसलिए उसने दिमाग की एक ना सुनी 
और उसकी कार का पीछा करने में मेरी साइकिल ने जान लगा दी

फिर क्या होना था 
थोड़ी देर बाद चल ही गया पता कि आज हो गई है बहुत बड़ी खता


माफी भी कैसे मांगता
उसका बड़ा भाई जो था गुस्से मैं खड़ा 


कहता भी क्या अगर माफी भी होती मांगनी 
क्योंकि वो प्यार था सिर्फ एक तरफा 
क्योंकि वो प्यार था सिर्फ एक तरफा


हुआ दो कदम मैं पीछे, थोड़ा मुड़ा और भागा वहां से 
कैसे समझाऊं तुम्हारे चक्कर में उस दिन आवारा बना था 


पर शायद तुमने मुझे असली में समझ लिया था 
क्या इसलिए तुमने अपने भाई को बुला लिया था ? 






अब तो –


नुक्क्ड़ों पर चाय भी मेरे नाम की पीने लगे हैं 
हर खबर को तेरी मुझ तक पहुंचाने लगे हैं 


मैं आशिक़ आवारा था बन गया 
खाम्खा उन दिनों मेरा खर्चा बढ़ गया 
खाम्खा उन दिनों मेरा खर्चा बढ़ गया 



बात तुमसे मैं करता भी कैसे 
क्योंकि देखा ही नहीं तुमने मुझे कभी उस नजर से 


लोग बेवजह ही बातें फैलाने लगे 
मना भी ना कर पाया मैं क्योंकि तुम मेरे दिल में जो थे छिपें  


मुझे क्या पता इतना बड़ा गुनाह मैंने कर दिया 
तुम्हारे उन आंसुओं से मैंने खुद को पिरो लिया 


वों आंसू ना आते उस वक्त भी 
तुमने समझने का मौका दिया नहीं कभी 


पर शायद पागल था मैं  
पर शायद पागल था मैं…… 

क्योंकि जहां मैंने ये सुना था कि-




अगर चाहत है तुम्हारी उससे मोहब्बत की 
  शिद्दत है तुम्हारी उसे अपना बनाने की


  पर तुम्हारी मोहब्बत में सच्चाई है अगर 
  पर तुम्हारी मोहब्बत में सच्चाई है अगर 


  तो फिर ये कायनाथ भी बदल जाए 

  चाहे फरिश्तों को ज़मी पर भी आना पड़ जाए 
  या समंदर में दो बूँद आंसू भी गिर जाए 


  फिर भी ढूंढ लोगे तुम उसे 

  क्योंकि नहीं हो तुम अकेले तुम इस जहां में 
  जरा खुद में भी कभी झाँको यहां वहां क्या है 
  जरा खुद में भी कभी झाँको यहां वहां क्या है

पर शायद जो भी सुना अच्छा ही है 
कम से कम मुझे पता तो चला कि तुमने कितनी मोहब्बत की है 


कितनी खुद्दारी है और कितनी है सच्चाई 
अब सॉरी/Sorry  मत करना क्योंकि पता चल गई है तुम्हारी बेवफाई 

क्यों दिया धोखा मुझे क्या रह गई कमी मुझसे 
क्या बिक गयी थी या हो गई थी अंधी  
जो देखा ही नहीं मुड़के वापस कभी 


फिर भी देता हूँ हर रोज पानी उस पौधे में 
जो तुम्हारी बेवफाई ने उगा दिया मेरे सीने में 


फिर भी यह दरवाजे खुले रहेंगे तुम्हारे लिए 
क्योंकि कई दिनों तक जाम जो हमने थे साथ पीऐ


अब भी ये कमबख्त दिल तुम्हें अपना मानता है 
तुम्हारे चाहत के धागे को मेरे जिस्म में पिरोता है 
तुम्हारी याद के सिरफिरे से मुझे खुशी देता है 


और खुश भी हूं मैं 
और खुश भी हूं मैं……. 
                                        
 पूछों क्यों ?




“क्योंकि आज भी मैं तुम्हें अपने अंदर ही महसूस करता हूं 
  जब जब भी मेरे पर्स में तुम्हारी फोटो देखता हूं……
  जब जब भी मेरे पर्स में तुम्हारी फोटो देखता हूं…
                                      तुम्हारी फोटो देखता हूं। 

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