Friday, September 25

छाया || Real Zindagi

छाया






हां……… छाया है यह छाया है
किसी के आशीर्वाद की छाया है

तो किसी के एहसास की छाया है
किसी के विश्वास की छाया है तो किसी के रूप की छाया है
यह कैसा रंग है इस छाया का विचित्र भंग है इस छाया का
देखा मैंने पारदर्शी रंग इस छाया का
अब रंग उतरता पाया इस छाया का
ममता के ममत्व में पाया इस छाया को
पिता के उम्मीदों में पाया इस छाया को
भाइयों के भ्रातृत्व में पाया इस छाया को
बहनों के विश्वास में पाया इस छाया को
बुजुर्गों के तजुर्बे में पाया इस छाया को
समाज के परंपरा में पाया इस छाया को
राष्ट्र के चेतना में पाया इस छाया को
पर वेदना है कि कहां से आ गया कमबख्त
ऊंच-नीच का भाव यहां

इन लोगों की सोच से पिछड़ते पाया इस राष्ट्र की छाया को।
इन लोगों की सोच से पिछड़ते पाया इस राष्ट्र की छाया को।


                                                                                    

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