Sunday, July 5

देखा है ! (PART-2)



देखा है !                                                     
                                                                                            (PART-2)

   

                                                                                      


हां…………. आज फिर थोड़ा कुछ देखा है 
कैसा भी सही पर कुछ नया देखा है 


इस उलझते संसार की माया को देखा है 
इस संसार के विचित्र छाया को देखा है 


इस छाया के सुकून को भी देखा है 
तो इस सुकून के पीछे की चुप्पी को 


इस चुप्पी की सार्थकता को 
तो इस सार्थकता के पीछे के दबाव को 


इस दबाव से बिगड़ते रिश्ते को 
उस रिश्तो के धागे बोलते देखा है 


हाँ………… देखा है 
कैसा भी सही पर कुछ नया देखा है 


उस धागे की पवित्ता को उजड़ते देखा है 
उस उझड़ते रिश्तो के अल्फाजों को देखा है 


और उन अल्फाजों की नियत बिगड़ते देखा है 
उस नीयत में निहित ईर्ष्या की जलन को देखा है 


उस जलन के पीछे के कारणों को देखा है 
उन कारणों को मैंने भेदभाव, बेरोजगारी,गरीबी, और शिक्षित  असमझदारी में बांटा है 


उस भेदभाव के पीछे के पैसों की आवृत्ति को देखा है
उस गरीबी के पीछे भ्रष्ट नीतियों को देखा है 


उन नीतियों पर राजनीतिक उदासीनता को देखा है 
उस बेरोजगारी के पीछे के आलस्य को देखा है 


उस आलस्य के पीछे पड़ी इस टेक्नोलॉजी को देखा है 
उस टेक्नोलॉजी मे आधुनिक एप्स (tic-tok) से लोगों को बिगड़ते देखा है 
पर फिर भी उस बिगड़ते परिवेश से लोगों को खुश देखा है 
उस खुशी से ही उनके आचरण का दिखावा देखा है 
और उस दिखावे से बढ़ती उनकी शिक्षित असमझदारी को देखा है 




हां…….. आज फिर कुछ देखा है हां आज फिर कुछ देखा है 
                                    कैसा भी सही पर कुछ नया देखा है 

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