Saturday, September 19

देखा है ! (PART-1)



देखा है !                                                      
                                                                                         (PART-1)





हां………. देखा है मैंने देखा है 
पूरा नहीं पर आधा ही सही पर कुछ तो देखा है


ना अनुभव है ना है तुजर्बा पर फिर भी अपनी समझ से कुछ देखा है बहुत कुछ बदलते देखा है, पर देखा है मैंने देखा है 


इस समाज को बदलते देखा है 
उसमें बदली संस्कृति को जकड़े देखा है

उस जकड़न की जड़ के धागे को 
उस कंठस्ठ शब्दों में उलझे वर्णों को 


उस उबलते हुए क्रोध की ज्वाला को 
उस क्रोध के पीछे की ईर्ष्या को 


उस ईर्ष्या के आने वाले अहं को भी मैंने देखा है 
हां देखा है पूरा नहीं पर आधा ही सही पर कुछ तो देखा है || 


देखा है फ़र्क़ – किसी के आने पर तो किसी को छोड़ने का 
                       किसी के स्वीकारने पर तो मन को तोड़ने का 
                       किसीके रूठने पर मनाने की चिंता का 
                       किसी के कृदन पर उसकी खुशी का 
                       किसी के सांये में किसी को सँवरने का 
                       हाथों की चूड़ी से चेहरे की चमक का 
                       मिठाई की खुशबू पर दिल धड़कने का 
                       उपहार की सौगादों पर मन की आवृत्ति का 
                       आवृत्ति की ध्वनि से फूलों की खुशबू का 
                       खुशबू की महक पर उड़ते भ्रमरों का 
                       भ्रमरों की गुनगुन से चिड़िया के चहचहाने का 
                       और भौर की किरणों से प्रकृति के अद्भुत रूप/नज़ारें                         का  


हां. . . . . . देखा है 
हां………. देखा है मैंने देखा है 
पूरा नहीं पर आधा ही सही पर कुछ तो देखा है।


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