Saturday, July 4

आइये जानते है कि क्या है हिंदी/भारतीय नववर्ष-

                   ” विशुद्ध विज्ञान आधारित है ‘भारतीय नववर्ष “

भारतीय ज्योतिष शास्त्र एवं कालगणना के अनुसार, भारतीयों का ” नववर्ष ” ‘वर्ष प्रतिपदा सेरंभ होता है। यही हमारा (राष्ट्रीय) नववर्ष भी है। ‘वर्ष प्रतिपदा अर्थात नववर्ष का प्रारंभ चैत्र-शुक्ल प्रतिपदा से होता है। चैत्र-शुक्ल प्रतिपदा को ही मानव सृष्टि का आरंभ हुआ था, इसीलिए इसे सृष्टि संवत् या ब्रह्म “संवत भी कहते हैं। “ज्योतिष विद्या के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘हिमाद्रि‘ से इसकी पुष्टि होती है, 
यथा –

चैत्रमासि जगद् ब्रह्म  ससजेप्रथमोऽहनि। शुक्ल पक्षे समग्रन्तु सदा सूर्योदये गति‘।

अर्थात् चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिवस सूर्योदय काल में सृष्टिकत्र्ता ब्रह्मजी ने सृष्टि की रचना की। इस संदर्भ में भास्कराचार्य अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सिद्धांत शिरोमणि में लिखते हैं कि चैत्र मास को शुक्ल पक्ष के प्रारंभ में रविवार के दिन से मास, वर्ष व युग एक साथ प्रारंभ हुए, इसीलिए भारत में प्रचलित सभी संवत् चैत्र-शुक्ल प्रतिपदा से ही आरंभ हुए। इनमें सम्राट् विक्रमादित्य का ‘विक्रमी संवत सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रचलित हुआ। विक्रमी संवत सूर्य सिद्धांत पर आधारित है। यदि सृष्टि संवत् के आरंभ से आज तक की गणना की जाए तो सूर्य सिद्धांत के अनुसार एक दिन का भी अंतर नहीं पड़ता। अत: विक्रम संवत् शुद्ध वैज्ञानिक सत्य पर टिका हुआ है।

प्रचलित संवतों में सबसे प्राचीन युगाब्द है। युगाब्द कलियुग के आरंभ का सूचक है जिसे पांच हजार से अधिक वर्ष हो गए हैं। सम्राट विक्रमादित्य ने आक्रमणकारी शकों को परास्त करके भारतभूमि से निकाल बाहर किया था, उसी की याद में विक्रमी संवत् प्रारंभ हुआ और विक्रमादित्य ने ‘शकारि उपाधि धारण की।

विक्रमी संवत् कलि संवत् के 3044 वर्ष बाद, शाके शालिवाहन संवत के 135 वर्ष पूर्व और सन ईस्वी के 57 वर्ष पूर्व आरंभ हुआ था। आज भी भारतीय समाज धार्मिक, सामाजिक और मांगलिक कार्यों के शुभ अवसर पर सवंत और भारतीय तिथियों का प्रयोग करता है।
 संकल्प मंत्र में कहते हैं-

अस्य श्री विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य, ब्राहृणां द्वितीये परार्धे

अर्थात् महाविष्णु द्वारा प्रवर्तित अनंत कालचक्र में वर्तमान ब्रह्मा की आयु का द्वितीय परार्ध-वर्तमान ब्रह्मा की आयु के 50 वर्ष पूरे हो गये हैं।


श्वेत वाराह कल्पे-कल्प

याने ब्रह्मा के 51वें वर्ष का पहला दिन है।

वैवस्वतमन्वंतरे– ब्रह्मा के दिन में 14 मन्वंतर होते हैं उसमें सातवां मन्वंतर वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है।

अष्टाविंशतितमे कलियुगे– एक मन्वंतर में 71 चतुर्युगी होती हैं, उनमें से 28वीं चतुर्युगी का कलियुग चल रहा है।


कलियुगे प्रथमचरणे– कलियुग का प्रारंभिक समय है। कलिसंवते या युगाब्दे- कलिसंवत् या युगाब्द वर्तमान में 5120 चल रहा है।

जम्बु द्वीपे, ब्रह्मावर्त देशे, भारत खंडे- देश प्रदेश का नाम

अमुक स्थाने – कार्य का स्थान अमुक संवत्सरे – संवत्सर का नाम

अमुक अयने – उत्तरायन/दक्षिणायन

अमुक ऋतौ – वसंत आदि छह ऋतु हैं

अमुक मासे – चैत्र आदि 12 मास हैं

अमुक पक्षे – पक्ष का नाम (शुक्ल या कृष्ण पक्ष)

अमुक तिथौ – तिथि का नाम

अमुक वासरे – दिन का नाम

अमुक समये – दिन में कौन सा समय

उपरोक्त में अमुक के स्थान पर क्रमश : नाम बोलने पड़ते हैं। जैसे अमुक स्थाने में जिस स्थान पर अनुष्ठान किया जा रहा है उसका नाम बोल जाता है।

उदहारण के लिए दिल्ली स्थाने, ग्रीष्म ऋतौ आदि। अमुक – व्यक्ति – अपना नाम, फिर पिता का नाम, गोत्र तथा किस उद्देश्य से कौन सा काम कर रहा है, यह बोलकर संकल्प करता है।

भारतीय धर्मशास्त्रों में कालगणना का विवेचन बहुत बारीकी और वैज्ञानिक ढंग से किया गया है। संकल्पित मांगलिक कार्यों के अवसर पर कल्प, मन्वन्तर, युगादि से लेकर संवत, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र, ग्रह आदि का मन्त्रोच्चार शुभ माना जाता है।

History:-
अपने नाम से संवत् चलाने की भी शास्त्रों में एक प्रक्रिया का वर्णन है। सम्राट विक्रमादित्य ने जनता का सारा ऋण राजकोष से चुकाकर सारी प्रजा को ऋण मुक्त कर दिया था, क्योंकि उस काल में राजा को अपने नाम का संवत चलाने के लिए यही शास्त्रीय नियम था। प्रयागराज में वात्स्यायन भारद्वाज की अध्यक्षता में धर्म संसद ने इसी दिन से सम्राट् विक्रमादित्य को अपने नाम से संवत चलाने का अधिकार दिया। इसके अतिरिक्त सम्राट विक्रमादित्य ने सभी 12 ज्योतिर्लिंगों का पुनरुद्धार कराया और उनमें से श्रेष्ठ महाकालेश्वर (उज्जैन) और सोमनाथ मन्दिर सौराट्र का पुर्ननिर्माण किया। अयोध्या में रामन्दिर का पुर्ननिर्माण कराया। भारत की पश्चिमी अन्तिम सीमा पर हिन्दूकुश के पास प्रथम शक्तिपीठ ‘हिंगुलाक्षामाता का मंदिर बनावाया और दूसरे शक्तिपीठ ‘कामाख्या देवी का मन्दिर भी बनवाया। उन्होंने असम से हिन्दूकुश (पेशावर) तक विशाल सडक़ मार्ग बनवाकर दोनों शक्तिपीठों को जोड़ दिया (आजकल इसे जी.टी. रोड कहा जाता है)। इस प्रकार भारत की सीमाओं को सामरिक दृष्टि से सुरक्षित किया।

भारतीय कालगणना से जुड़े तथ्य-

एक चतुर्युगी की समयावधि – 43 लाख 20 हजार वर्ष
सत युग की समयावधि – 17 लाख 28 हजार वर्ष
त्रेता युग की समयावधि – 12 लाख 96 हजार वर्ष
द्वापर युग की समयावधि – 8 लाख 64 हजार वर्ष
कलियुग की समयावधि – 4 लाख 32 हजार वर्ष
कलियुग सम्वत् – 5117-18 आरंभ

1. उत्तरायण का आरम्भ मकर संक्रान्ति से होता है और दक्षिणायन का आरम्भ कर्क संक्रांति से होता है।
2. वर्ष में छह ऋतुएं होती हैं वसन्त (चैत्र-वैशाख), ग्रीष्म (ज्येष्ठ-आषाढ़), वर्षा (श्रावण-भाद्रपद), शरद् (आश्विन-कार्तिक), हेमन्त (मार्गशीर्ष-पौष), शिशिर (माघ-फाल्गुन)।
3. पंचांग में केवल एक वर्ष का विचार होता है। भारतीय पंचांग में मास दो प्रकार के हैं एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक का समय ‘चान्द्र मास कहलाता है। ऐसे 12 चान्द्र मासों से 354 दिनों का एक चान्द्र वर्ष होता है। एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति तक के समय को सौर मास कहते हैं और ऐसे 12 सौर मासों का एक सौर वर्ष माना जाता है। दिन की गणना एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक मानी जाती है।
4. भारतीय पंचांग में मासों के नाम का आधार वैज्ञानिक है अर्थात् भारतीय महीनों का नाम चन्द्रमा की स्थिति के नाम पर किया गया है। पूर्णिमा को चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसी नक्षत्र के आधार पर उस मास का नाम रखा गया है, जैसे –

नक्षत्र का नाम मास का नाम वेदकालीन-

चित्रा चैत्र मधु
विशाखा वैशाख माधव
ज्येष्ठा ज्येष्ठ शुक्र
उत्तराषाढ़ा आषाढ़ शुचि
श्रवण श्रावण नभ
उत्तराभाद्रपद भाद्रपद नभश्च
अश्विनी आश्विन इष
कृतिका कार्तिक ऊर्ज
मृगशिरा मार्गशीर्ष सह
पुष्य पौष सहरथ
मघा माघ तप
उत्तरा फाल्गुणी फाल्गुन तपस्य

हमारी कालगणना से जुड़े तथ्य-

वैज्ञानिक : यह सौर मंडल के ग्रहों पर आधारित है जिनकी सत्यता स्वयं सिद्ध है। मुख्य रूप से हमारी कालगणना पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा की स्थितियों व गतियों पर आधारित है।

अत्यन्त प्राचीन : हमारी कालगणना वैदिक काल जितनी ही प्राचीन है। वैदिक साहित्य में यज्ञों के लिए उपयुक्त समय निर्धारित करने के लिए वेदांग ज्योतिष का विकास हुआ था। उस काल में उत्तरायण-दक्षिणायन, संवत्सर, परिवत्सर, इदा वत्सर, अनुवत्सर तथा इतावत्सर नामक पांच संवत्सरों का बोध, अमावस्या तथा पूर्णमासी का यज्ञीय महत्त्व भी ज्ञात हो चुका था। ये सब अवधारणाएं सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि ग्रहों की गतियों के वैज्ञानिक ज्ञान पर ही आधारित हैं।

अत्यन्त विस्तृत : हमारी कालगणना अल्पतम से विशालतम तक विस्तृत है जिसमें ‘त्रुटि (1 सैकंड का 33750वां भाग) से लेकर कल्प (1000 महायुग) अर्थात 4 अरब 32 करोड़ सौर वर्ष तक की गणना का विधान है। ऐसी सुविधा या विधान विश्व की अन्य किसी भी कालगणना में नहीं है।

अमानुषिक : हमारी कालगणना किसी व्यक्ति विशेष के जन्म या उसके किसी कृत्य विशेष से आरंभ नहीं होती। इसका प्रारंभ सृष्टिï के प्रारंभ के साथ ही हो जाता है, इसलिए यह ‘अमानुषिक है।

काल गणना का आरम्भ : माधवाचार्य कृत ‘कालमाधव में ब्रह्मïपुराण का एक श्लोक उपलब्ध है जिसके अनुसार ‘ब्रह्मïजी ने चैत्रमास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को लंका में सूर्योदय के समय संसार की सृष्टिï की थी और उसी समय से कालगणना चालू की थी। उसी समय ग्रहों, वारों, मासों, ऋतुओं तथा संवत्सरों का भी आरंभ हुआ, इसलिए तभी से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को भारत में वर्ष प्रतिपदा मनाने की प्रथा चली आ रही है।

संकल्प मन्त्र -हमारी सभी धार्मिक क्रियाओं में उच्चारण किया जाने वाला संकल्प मंत्र भी सृष्टिï-आरंभ के साथ देशकाल का सूत्ररूप में परिचय भी देता है कि देश-काल की सन्धि के किस बिन्दु-विशेष पर किसी कार्य को करने का संकल्प किया जा रहा है। अर्थात किस देश में, किस काल में, कौन व्यक्ति, किस काम को, किस उद्देश्य से करना चाहता है। यह भी हमारी वैज्ञानिक गणना पर ही आधारित है।

सौर गणना और चन्द्रा गणना – भारतीय पंचांगों में काल की गणना सूर्य और चन्द्र दोनों के अनुसार होती है।

(अ) सौर गणना – पृथ्वी लगभग एक लाख किलोमीटर प्रति घंटे की गति से सूर्य की परिक्रमा पूरी करती है जिसमें 365.25 दिन का समय लगता है। यह एक सौर वर्ष का परिमाण है। इसके 12वें भाग को एक सौर मास और एक सौर मास के 30वें भाग (अर्थात् सौर वर्ष के 360वें भाग) को एक सौर दिन कहते हैं। इस प्रकार एक सौर मास में 30 दिन 10.5 घंटे (लगभग) और एक सौर दिन लगभग 24 घंटे 21 मिनट का हुआ।

(आ) चन्द्र गणना – चन्द्रमा पृथ्वी के गिर्द अपना चक्र 29 दिन 12 घंटे में पूरा करता है, अत: चान्द्र मास की सीमा 291/2 दिन हुई। इसलिए लगभग एक वर्ष में 12 दिन का अन्तर पड़ जाता है। चन्द्रमा आकाश में नक्षत्रों को मापता है (उपर्युक्त गति), इसी से मास और अर्धमास (पक्ष) बनते हैं। एक मास में 30 तिथियां होती हैं। 15वीं तिथि को पूर्णिमा तथा 30वीं तिथि को अमावस्यां कहते हैं। मास पूर्णिमान्त होते हैं।
9. उत्तरायरण का आरंभ मकर संक्रांति से और दक्षिणायन का आरंभ कर्क संक्रांति से होता है।
10. सौर मास संक्रंति से आरंभ होते हैं।
11. दिन का विस्तार सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक होता है अर्थात हमारी गणना में दिन का आरंभ सूर्योदय से मान्य है, न कि आधी रात को 12 बजे के बाद।
एक अन्य गणना-
1 विपल = 1 गुरु अक्षर का उच्चारण काल (0.4 सैकंड)
10 गुरु अक्षर = 1 असु (4 सैकंड)
6 असु = 1 पल (24 सैकंड)
7 अहोरात्र = 1 सप्ताह
15 अहोरात्र = 1 पक्ष
2 पक्ष = 1 मास
2 मास = 1 ऋतु
3 ऋतु = अयन
2 अयन = 1 वर्ष
चार युग व उनकी आयु
1-कलियुग = 432000 वर्ष
(कलियुग की बीती आय – 5111 वर्ष)
(कलियुग की शेष आयु – 426889)
द्वापर युग = 864000 वर्ष
त्रेता युग = 1296000 वर्ष
सतयुग = 1728000 वर्ष
43,2,0,000 वर्ष = 1 महायुग
1000 महायुग (4,32,0000,000 वर्ष) = 1 कल्प
(एक कल्प में 14 मनवन्तर होते हैं। अब तक छ: मनवन्तर बीत चुके हैं और ‘वैवस्वत’ नामक सातवां मनवन्तर चल रहा है)
सृष्टि सम्वत् या सृष्टि का आरंभ वर्ष – 1,95,58,85,109

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व-

1.इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की।
2.सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया। इन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारंभ होता है।
3.प्रभु श्री राम के राज्याभिषेक का दिन यही है। 
4.शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है।
5.सिखो के द्वितीय गुरू श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस  है। 
6. स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृणवंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया |
7. सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार भगवान झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।
8. विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना। विक्रम संवत की स्थापना की ।
9. युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।
10 संघ संस्थापक प पू डॉ केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म दिन ।
11 महर्षि गौतम जयंती

भारतीय नववर्ष का प्राकृतिक महत्व
1. वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
2.फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
3. नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।

                                           धन्यवाद। 

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