आधुनिक सच/ Modern Truth (Under which we are forgetting our culture)

  Modern Truth / आधुनिक सच A Beautiful poem on Modern truth – Under which we are forgetting our culture मियां-बीबी दोनों मिल खूब कमाते हैं  तीस लाख का पैकेज दोनों ही पाते हैं सुबह आठ बजे नौकरियों पर जाते हैं  रात ग्यारह तक ही वापिस आते हैं अपने परिवारिक रिश्तों से Continue Reading

फिदरत….A comedy romantic poem

     फिदरत तेरी चाहत को मैं अपना आंचल बना लूंगा  तू एक बार मिल तो सही तुझे कचौरी भी खिला दूंगा क्या खाने में ही तेरा जी मरा है  क्या उसमें भी कोई राज छिपा है  जो बुलाया करती थी मुझे अकेला रात-रात भर  और करवाया करती थी सारा Continue Reading

बनो राजनेता/poem on politics

  बनो राजनेता बनो राजनेता तुम, बनो राजनेता  निष्पक्ष,सेवाभावी, स्वभाव रखो राजनेता  इस पद के मिलते ही तुम हो जाओगे शक्तिमान  शक्ति की अंधड़ में मत करना इसका अपमान  बनो राजनेता, तुम बनो राजनेता  निष्पक्ष, सेवाभावी, स्वभाव रखो राजनेता  इस पद के लालच में ना तुम किसी को बेचना  शक्तिवान होने के बाद Continue Reading

मातृभाषा हिंदी / Poem on HINDI Diwas (हिंदी दिवस/अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस)

  मातृभाषा हिंदी  हिंदी को पाया-  पाया है मैंने पाया है, फिर से हिंदी का जमाना आया है  जिस राष्ट्र का नाम ही हिंद है वहां फिर से किसी ने हिंदी को गुनगुनाया है  लगता है आज हिंदी का उसकी आजादी में पाया है  अब उसके ही अधिकारों के स्वतंत्रता की छाया है  Continue Reading

आया फिर ये सावन आया

आया फिर ये सावन आया  आया फिर ये सावन आया  पतझड़ के मौसम को फिर भगाया  नई खुशबू नए रंगों को लाया  हम सबके मन को बहुत है भाया  हम सबके मन को बहुत है भाया   नया-नया मौसम ले आया  हल्की बिंदु की बौछार ले आया  अमन, खुशहाली, चैन है लाया  Continue Reading

राहगीर/ क्योंकि कल का सूरज फिर उगेगा…

  राहगीर मैं तो राहगीर हूं राह करता रहूंगा  कल का सूरज फिर उगेगा  नई रोशनी नई उमंग नई राह लाएगा  क्योंकि कल का सूरज फिर उगेगा।। फर्क है दोनों में, राहगीर और पथिक में  पता नहीं लोगों को इनमें,पता नहीं लोगों को इनमें क्योंकि पथिक पथ पर चलेगा और मैं तो राहगीर Continue Reading

आंसू……

    आंसू ये आंसू कैसे हैं ये आंसू ?  क्यों है ये आंसू ? क्यों नम है ये आंसू ?  क्या ये आंसू भी कुछ बोल रहे हैं ? पर कोई इनकी सुनता क्यों नहीं है ? वजहें तो बहुत है इन आंसुओं की  पर शायद ही कोई मरहम हैं इन आँसुओ Continue Reading

वजह ढूंढता हूं ! (Wajah dhundhta hun)

वजह ढूंढता हूं ! मैं ढूंढता हूं, बहुत कुछ ढूंढता हूं  मैं ढूंढता हूं, बहुत कुछ ढूंढता हूं पाता हूं इस पिछड़ी सोच को पर फिर भी ढूंढता हूं  दूसरों की सफलता पर उस ईर्ष्या वाली सोच को ढूंढता हूं  सफलता में बाधक बने उस आलस्य की जड़ को ढूंढता हूं  लोगों के मुंह Continue Reading

भारतीय संस्कृति एवं मूल्य व्यवस्था (Indian culture and value system)

भारतीय संस्कृति एवं मूल्य व्यवस्था (Indian culture and value system) परंपरा,प्रतिष्ठता,सभ्यता समाज से  एकता,अखंडता,रुपता समाज से  धरोहरें,दृढ़ता का रुप है समाज से  महानता की श्रंखला भी है यहां समाज से। विश्व मैं पहचान दिलाती है ये संस्कृति  मूल्य अवधारणा का प्रारूप है ये संस्कृति  अनेक राज्यों की एकता दिखाती है ये संस्कृति  अपनी पहचान Continue Reading