Thursday, September 17

राहगीर/ क्योंकि कल का सूरज फिर उगेगा…



  राहगीर




मैं तो राहगीर हूं राह करता रहूंगा 
कल का सूरज फिर उगेगा 
नई रोशनी नई उमंग नई राह लाएगा 
क्योंकि कल का सूरज फिर उगेगा।।


फर्क है दोनों में, राहगीर और पथिक में 
पता नहीं लोगों को इनमें,पता नहीं लोगों को इनमें
क्योंकि पथिक पथ पर चलेगा और मैं तो राहगीर हूं राह करता रहूंगा 
                                               और मैं तो राहगीर हूं राह करता रहूंगा  


उलझन है एक समस्या है मेरी
वह तो पथिक था चल दिया वहां भी जहां गलियां थी अंधेरी 
और उलझ गया गहरी सोच में मैं, और कर दी मैंने देरी 


अब मुश्किल है चुनना रास्ता इनमें 
समान हैं दोनों किनारे इनमें 


कांटों और पत्थरों का संग है इनमें 
फिर भी हल्की-हल्की खुशबू है इनमें 


सावन ने भी फुहार छोड़ी है इनमें 
वसंत के नए रंग रूप का रंग है इनमें 


अब सब समान होता जा रहा है क्यूंकि दिन ढलता जा रहा है  
यह सब मुझे ओर उलजाता जा रहा है 
क्या करूँ अब कुछ भी समझ नहीं आ रहा है 


अरे! मैं तो भूल ही गया, चलो अच्छा है देर से ही सही मुझे याद तो आया कि, मैं तो राहगीर हूं, राह करना मेरा काम है 


अब तो मैं राह करूंगा, और कल का सूरज फिर देखूंगा !
                                 क्योंकि कल का सूरज फिर उगेगा।। 

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