Wednesday, June 3

आइये प्रभु श्रीनाथजी के बारे में जानते हैं-





आइये प्रभु श्रीनाथजी के बारे में जानते हैं-



17 वीं शताब्दी में निर्मित, श्रीनाथजी मंदिर भगवान श्रीनाथजी (भगवान कृष्ण का रूप) को समर्पित है। ‘श्रीनाथजी की हवेली’ श्रीनाथजी मंदिर के लिए प्रयुक्त पर्यायवाची वाक्यांश है। ‘नाथद्वारा’ शब्द दो शब्दों से बना है, एक ‘नाथ’ जिसका अर्थ है ‘भगवान’ और दूसरा ‘द्वार’ है, जो ‘द्वार’ का सुझाव देता है।



?”श्रीनाथजी बावा का दिव्य स्वरुप“?

?श्रीनाथजी बावा का अति सुंदर स्वरुप स्वयं प्रकट हुआ है। वह किसी मनुष्य का बनाया हुआ नहीं। श्रीजी बावा का स्वरूप श्री कृष्ण सात वर्ष की आयु के हो वैसे दर्शन का भाव है।


?श्रीनाथजी बावा श्री गिरीराजजी के निकुंज द्वार पर खडे है।


?आपश्री का श्री बायां हस्त ऊपर है। वह श्री हस्त से श्रीजी बावा अपने भक्तो को अपने निकट बुलाते है।


? दायें श्री हस्त को श्रीजी ने अपनी कटी पर धारण किया है। जिसके कारण भक्त का मन उनके तरफ आकर्षित होता है, श्रीजी बावा के श्री नेत्र निचे की और झुके हुए है।


?श्रीजी बावा की पीठिका लंबचोरस है। पीठिका की तीन बाजुओ पर गिरिकन्दरा के दर्शन होते है। श्री गिरिराजजी के शिलाखंडो की आकृति है।


?पीठिका में श्रीनाथजी के श्री मस्तक के ऊपर पोपट (तोता) है।


? बायीं और दो मुनि है। उनके नीचे सर्प है। सर्प के नीचे सिंह है। सबसे नीचे दो मोर है।


? दायीं और मुनि है, उनके नीचे एक घेंटु (भेड) है, उनके नीचे शेषनाग है और सबसे नीचे दो गाय है, यह सब श्रीनाथजी के दर्शन पूज्यभाव से करते हो ऐसा प्रतित होता है।


?श्रीजी बावा को अलग अलग ऋतुओ के अनुसार अलग अलग प्रकार के श्रृंगार धराये जाते है।


? नित्य आठ समय के दर्शन सुबह मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, दोपहर के बाद उत्थापन, भोग, संध्या तथा शयन के दर्शन होते है। आरती भी नित्य चार समय होती है।


?श्रीनाथजी बावा का  राजाशाही ठाठ है। नित्य श्रीजी को सुंदर वस्त्र, हीरा-मोती-पन्ना-माणेक का ऋतु मुताबिक श्रृंगार धराया जाता है तथा तिथि के मुताबिक सुंदर पिछवाई धराई जाती है। 


?उसी तरह श्रीजीबावा को अत्यंत सुंदर प्रकार के व्यंजनों की सामग्री धराई जाती है। वह सामग्री दर्शन करने आनेवाले भक्तो को महाप्रसाद के रूप में मिलती है।


?श्रीनाथजी बावा का वैभव सबसे अलग है। प्रभु अपने भक्तो को बाल तथा किशोर वय स्वरुप में नित्य झाँखी कराते है। आठ समय की झाँखी का उद्देश तथा अर्थ अलग अलग है।





?मंगला से शयन पर्यत आठो पहर के दर्शन तथा इनके भावार्थ:-


?(१) मंगला के दर्शन “श्री नवनीत प्रियाजी के भाव से”
{मंगला – के दर्शन करने से कभी कंगाल नहीं होते}


?(२) शृंगार के दर्शन “श्री गोकुल चंद्रमाजी के भाव से”
{श्रृंगार – के दर्शन करने से स्वर्ग लोक मिलता है}


?(३) ग्वाल के दर्शन “श्री द्वारका नाथजी के भाव से”
{ग्वाल- के दर्शन करने से प्रतिष्ठा बनी रहती है}


?(४) राजभोग के दर्शन “श्री गोवर्धन नाथजी के भाव से”
{राजभोग – के दर्शन करने से भाग्य प्रबल होता है}


?(५) उत्थापन के दर्शन “श्री मथुरा नाथजी के भाव से”
{उत्थापन – के दर्शन करने से उत्साह बना रहता है}


?(६) भोग के दर्शन “श्री गोकुल नाथजी के भाव से”
{भोग – के दर्शन करने से भरोसा बना रहता है}


?(७) संध्या आरती के दर्शन “श्री विट्ठल नाथजी के भाव से”
{आरती – के दर्शन करने से स्वार्थ न रहे कभी}


?(८) शयन के दर्शन “श्री मदन मोहनजी के भाव से”
{शयन – के दर्शन करने से शान्ति बनी रहती है}

पुष्टिमार्ग के दश मर्म:-

1.आशरो द्रढ ऐक श्री वल्लभाधीश को।


2.मानसी रीत की मुख्य सेवा व्यसन ।


3.लौक वैदीक त्याग शरण गोपीश को ।


4.दीनता भाव उद्बोध गुण गान सों ।


5.घोष त्रिय भावना उभय जाने श्रीकृष्ण नाम स्फुरे पल न आज्ञा टरे।


6.कृत वचन विश्र्वास द्रढ चित आने ।


7.भगवदीय जानी सत्संग को अनुसरे ।


8.न देखे दोष अरु सत्य भाखे ।


9.पुष्टी पथ मर्म दश धर्म यह वीधी कहे ।


10.सदा चित्त मे श्री द्वारकेश राखे ।

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