Friday, September 18

वजह ढूंढता हूं ! (Wajah dhundhta hun)



वजह ढूंढता हूं !






मैं ढूंढता हूं, बहुत कुछ ढूंढता हूं 
मैं ढूंढता हूं, बहुत कुछ ढूंढता हूं


पाता हूं इस पिछड़ी सोच को पर फिर भी ढूंढता हूं 
दूसरों की सफलता पर उस ईर्ष्या वाली सोच को ढूंढता हूं 


सफलता में बाधक बने उस आलस्य की जड़ को ढूंढता हूं 
लोगों के मुंह का उपहास बनी उस दुर्बलता का रहस्य को ढूंढता हूं 


ढूंढता हूं, कुछ ढूंढता हूं 
हां! अब भी मैं कुछ बोलता हूं 


ऐसा नहीं है कि सिर्फ नकारात्मकता को ही ढूँढता हूं 
ऐसा नहीं है कि सिर्फ नकारात्मकता को ही ढूंढता हूं……. 


मिट चुके उन परिवारों के संयोजन का राज ढूंढता हूं 
उन पैरों तले दबी मिट्टी की खुशबू को ढूंढता हूं 


उन प्रकृति के बर्बादी के रसायनों को ढूंढता हूं 
उन प्रगति के पीछे छिपी दूसरों की मेहनत को ढूंढता हूं 


हाँ… उन आशीर्वादों की माला को ढूँढता हूं 
        उन आशीर्वादों की माला को ढूँढता हूं 




कुछ और भी ढूँढना चाहता हूँ 
कुछ और भी है उसे बताना चाहता हूं…… 


ऐसा नहीं है कि सिर्फ आक्षेप की भाषा को ढूंढता हूं 
वैसा भी नहीं है कि सिर्फ आक्षेप की भाषा बोलता हूं 
उस वर्णमाला से बने शब्दों के सुई धागे को ढूंढता हूं 


उस गलियारे की शांति को ढूंढता हूं 
उस आंसुओं की माला को ढूंढता हूं 


उस अशांति के पीछे भ्रष्टाचार को ढूंढता हूं 
उस सीमा पर गिरे धुएं की वजह सुनता हूं 


उस धुँए से परिवार की मुखिया के शहीद हो जाने की वजह 
उसके जाने से आने वाली खुशियों के मिट जाने की वजह ढूंढता हूँ 
हाँ….. ढूंढता हूँ। 


बस ढूंढता हूँ ऐसे ही वजहें ढूंढता हूँ 
मैं तो राही हूँ इस राह का, पैरो में चुभें काटों में भी निर्मलता ढूंढता हूं
और बस इस कांटे के चुभने से उसके टूट जाने का राज़ ढूंढता हूँ  


मैं तो राही हूं,बस राह की वजहें ढूंढता हूं
                    बस राह की वजहें ढूंढता हूं || 

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