Wednesday, June 3

kuch Ansune alfaz zindagi ke (1) कुछ अनसुने अल्फ़ाज़ ज़िन्दगी के || Real Zindagi



कुछ अनसुने अल्फ़ाज़ ज़िन्दगी के



⇒दर्द कैसे लिखूं,
इसे कैसे लिखूं,
यह दर्द है साहिब!
इसे बयां कैसे करूं,
यही तर्क है साहेब!
गुलाबो की बस्ती में भी काटें रहा करते है,
यह उनकी परवाह है इसलिए उनके पास बसा करते हैं,
यह उनकी परवाह है इसलिए उनके पास बसा करते हैं||

⇒अगर हाथ जले हुए हो तो गर्म चिमटा नहीं पकड़ा करते
क्योंकि वर्णमाला का क्रम बिगड़ने लगे तो शब्द भी साथ छोड़ देते है ||

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