Thursday, September 17

फिदरत….A comedy romantic poem

  


  फिदरत








तेरी चाहत को मैं अपना आंचल बना लूंगा 
तू एक बार मिल तो सही तुझे कचौरी भी खिला दूंगा


क्या खाने में ही तेरा जी मरा है 
क्या उसमें भी कोई राज छिपा है 


जो बुलाया करती थी मुझे अकेला रात-रात भर 
और करवाया करती थी सारा काम गली गरबार पर 


पर अब मेरी बारी है 
मेरे पास भी दूध छानने की ज़ारी है 


छान लूंगा पूरा का पूरा तुझे मैं  
अलग कर दूंगा पूरा कचरा तुझसे 


डाल दूंगा शक्कर और रंग 
पहना दूंगा केसरिया ढंग 


तब्दील कर दूंगा मेरी चाहत को……..  
तब्दील कर दूंगा मेरी चाहत को……..  
और मेरी पलकों पर भी उठा लूंगा तुझको 


फिर भी तुने अगर मुझे अपना ना माना 
तो तू शायद मेरी हिस्ट्री(History) नहीं जानती 
तो तू शायद मेरी हिस्ट्री(History) नहीं जानती
कि मेरी भी फिदरत है आधे रस्ते में छोड़ भाग जाना।। 
      मेरी भी फिदरत है आधे रास्ते में छोड़ भाग जाना।। 

Leave a Reply